मध्यप्रदेश के बौद्ध अभिलेखों पर रोशनी डालती पुस्तक 'सांची दानं'

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लेखक मोतीलाल आलमचंद का यह तीसरा और परिवर्धित संस्करण है जो पहले के दो संस्करणों से बहुत विस्तृत है, लेखक वर्तमान में पोहरी एसडीएम के पद पर पदस्थ हैं 


शिवपुरी।
यदि किसी पुस्तक को पढ़ते समय पाठक का मन उससे बाहर निकलने का न कहे तो उस पुस्तक को सार्थक माना जाएगा। मोतीलाल आलमचंद की 'सांची दानं' पढ़ते समय ऐसा ही लगता है। सांची दानं का यह तीसरा और परिवर्धित संस्करण है जो पहले के दो संस्करणों से बहुत विस्तृत है। मोतीलाल आलमचंद मध्यप्रदेश सरकार में अधिकारी हैं और बौद्ध धर्म तथा ब्राह्मी (धम्मलिपि) पर कई किताबें लिख चुके हैं। 'सांची दानं' पर वह कई सालों से काम कर रहे हैं जिसका परिणाम यह तीसरा संस्करण है। इसे पढऩा सांची और मध्य प्रदेश के बौद्ध स्थलों को निकट से देखने जैसा है। पढ़ते समय लगा कि मैं उन अभिलेखों के समक्ष खड़ा हूं और उनसे बात कर रहा हूं। ग्लेज पेपर और कई रंगों में छपी पुस्तक आकर्षक होने के साथ ही छपाई बहुत साफ है। मोतीलाल जी पुस्तकों की विशेषता है कि उन्होंने  इनमें ब्राह्मी लिपि को आज के कंप्यूटर पर टाइप किया है। यह अद्भुत है। टाइप करने से वे सुघड़ लगते हैं हालांकि मात्रा लगाने में कुछ असुविधा होती होगी जैसा पुस्तक को देखने से लगता है। लेकिन हिंदी के फांट के बीच भी इस ब्राह्मी फांट का उपयोग अच्छी तरह किया गया है।

इसमें मोतीलाल आलमचंद ने कई नई स्थापनाएं की हैं जो तार्किक हैं और इतिहास में अब तक स्थापित तथ्यों में संशोधन करती हैं। जैसे भोजपुर (मुरेलखुर्द या मुरेलखुद्द) से प्राप्त अस्थि कलश जिस पर मात्र एक शब्द अंकित है—पतीतो। यह कलश अलेंक्जेंडर कनिंघम को मिला था और उन्होंने इसका अर्थ पतित समझा और बताया कि इसमें उस भिक्षु की अस्थियां हैं जिन्हें किसी अपव्यवहार के कारण दंडित किया गया था। मोतीलाल जी ने इसे गलत बताते हुए ठोस तर्क दिए हैं कि पतीतो का अर्थ पतित नहीं अपितु मुदित होता है। यह पतीतो है जिसका अर्थ प्रसन्नचित्त होता है। उनका तर्क है कि क्या किसी दंडित भिक्षु की अस्थियां मुख्य स्तूप में आदर के साथ रखी जा सकती हैं। इस तरह एक ही शब्द के अभिलेख को गलत पढऩे से अर्थ का अनर्थ हो गया। पुस्तक के अंत में उनका एक शोधपत्र भी है जिसमें उन्होंने पानगुराडिया और सारू मारू के अभिलेखेां के आधार पर बताया है कि इसमें प्रयुक्त शब्द राजकुमार से यह सिद्ध नहीं होता कि अशोक जब यहां आए थे और यह अभिलेख अंकित कराया तो वह कुंवारे थे। यदि ऐसा होगा तो ये अभिलेख अशोक के पहले अभिलेख होने का स्थान पा जाएंगे जबकि ऐसे प्रमाण नहीं मिलते। पुस्तक 730 पेज की है। एक पेज पर एक अभिलेख दिया गया है। कहीं कहीं अभिलेखों की कॉपी करने और उसके प्राकृत में उच्चारण में अंतर आ गया है,जिसे अगले अंक में सुधारा जाना चाहिए। एक बात और मुझे खटकी कि जिन अभिलेखेां के बारे में बताया गया है,वे कहां से, कब और कैसे मिले इसे भी चार पांच लाइनों में देने से उसकी उपयोगिता और बढ़ जाती। कुछ मे तो यह जानकारी है कुछ में नहीं है। कहीं कहीं रिपीटीशन भी है जैसे 662 और 663 पर बेसनगर के अभिलेख 'असभाये दानं' और 'मितस' के नीचे बेसनगर को संरक्षित करने की आवश्यकता की बात शब्दश: रिपीट हो गई है। पेज 705 पर पानगुरारिया के अभिलेख में पहली लाइन में लेख लिखाने की संख्या 256 को रोमन में लिखा गया है जबकि अशोक ने अपने अभिलेख में इसके लिए तीन शब्द-200,50 और 6 के लिए अलग अलग चिह्न प्रयोग किए हैं। प्रारंभ में ब्राह्मी लिपि के बारे में जानकारी देने के साथ उसके वर्णों और मात्राओं की जानकारी तथा ग्यारहखड़ी दी गई है जिससे लोगों को यह लिपि सीखने में भी मदद मिलेगी। पुस्तक का प्रकाशन भोपाल के धम्मलिपि प्रकाशन ने किया है। इसका मूल्य 1500 रुपये है और अमेजन पर 1200 में उपलब्ध है। मध्य प्रदेश के इतिहास, बौद्ध स्थलों और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए यह पुस्तक एक अमूल्य निधि साबित होगी। इसे जरूर पढऩा चाहिए।

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