पिछोर (नीरज गुप्ता)। राजनीतिक रूप से प्रदेश की चर्चित और प्रभावशाली मानी जाने वाली पिछोर विधानसभा क्षेत्र विकास के मोर्चे पर आज भी पिछड़ता नजर आ रहा है। हॉट सीट के रूप में पहचान रखने वाले इस क्षेत्र से चुने गए जनप्रतिनिधियों की सीधी पहुंच प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र सरकार तक बताई जाती है, लेकिन इसके बावजूद पिछोर नगर में आज तक कोई बड़ा उद्योग या कारखाना स्थापित नहीं हो सका है।
वहीं राज्य सरकार द्वारा पुरातत्व विभाग में शामिल किए गए ऐतिहासिक पिछोर किले का जीर्णोद्धार कार्य भी तय समय सीमा बीत जाने के बाद अधूरा पड़ा हुआ है। नगर परिषद और निर्माण एजेंसी की ढिलाई के कारण काम की रफ्तार बेहद धीमी है, जिससे स्थानीय नागरिकों में नाराजगी बढ़ रही है। किले के विकास में देरी का असर पर्यटन पर भी पड़ रहा है और बाहर से आने वाले पर्यटक मायूस होकर लौट रहे हैं। पिछोर से करीब 20 किलोमीटर दूर राजपुर क्षेत्र में स्थित प्राचीन बौद्ध स्तूप, कछौआ-पनिहारी तथा जीवाजी राव स्टेट काल की ऐतिहासिक धरोहरें इस इलाके की समृद्ध विरासत की गवाही देती हैं। क्षेत्र में दर्जनों प्राचीन किले, बावड़ियां और पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं, जिनसे जुड़ी लोककथाएं और इतिहास आज भी लोगों के बीच जीवित हैं। इसके बावजूद इन धरोहरों के संरक्षण और विकास की दिशा में ठोस पहल नहीं हो पाई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिम्मेदार विभागों ने शासन से मिले बजट का सही उपयोग नहीं किया, जिसके कारण कई योजनाएं जमीन पर उतरने से पहले ही धीमी पड़ गईं। क्षेत्रवासियों का मानना है कि यदि पिछोर किले सहित आसपास के प्राचीन स्थलों को पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जाए तो इससे न केवल क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय बाजारों को बढ़ावा मिलेगा और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि कब जागेंगे और पिछोर की ऐतिहासिक विरासत को विकास की नई दिशा देंगे।


