शिवपुरी। मध्य प्रदेश की राजनीति में दो अहम नियुक्तियों ने सत्ता की रणनीति को साफ कर दिया है संघर्ष और समीकरण, दोनों को साथ लेकर चलना। गुना में इतिहास रचने वाले कृष्णपाल सिंह यादव (केपी यादव) को नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाया गया है, वहीं वरिष्ठ नेता रामनिवास रावत को राज्य वन निगम का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है।
केपी यादव की पहचान उस नेता के रूप में है जिसने 2019 में ज्योतिरादित्य सिंधिया को गुना लोकसभा सीट पर करीब सवा लाख वोटों से हराकर सियासी इतिहास बदल दिया। यह वही सीट थी जहां सिंधिया राजघराने का दशकों से अटूट वर्चस्व था। खास बात यह कि कभी सिंधिया के करीबी रहे यादव ने ही उनके खिलाफ यह जीत दर्ज की। उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट 2018 रहा, जब मुंगावली से कांग्रेस टिकट कट गया। इसके बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा। विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद पार्टी ने उन पर भरोसा जताया और 2019 में उन्हें मैदान में उतारा, जहां उन्होंने इतिहास रच दिया। 2024 में टिकट नहीं मिलने के बाद भी उनकी सक्रियता बरकरार रही और अब निगम अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह संदेश दिया है कि संघर्ष करने वालों की अहमियत बनी रहती है।
दूसरी ओर, रामनिवास रावत का सियासी सफर उतार-चढ़ाव और अनुभव का मिश्रण है। विजयपुर से छह बार विधायक रह चुके रावत लंबे समय तक कांग्रेस का बड़ा चेहरा रहे, लेकिन 2024 में भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद उन्हें वन मंत्री बनाया गया, लेकिन नवंबर 2024 के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी से मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। रावत इससे पहले 2018 में भी अपनी पारंपरिक सीट से हार चुके थे, लेकिन 2023 में उन्होंने जोरदार वापसी की थी। बावजूद इसके, उपचुनाव में हार ने उनके राजनीतिक सफर में नया मोड़ ला दिया। अब वन निगम अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट दर्जा देना यह दर्शाता है कि पार्टी उनके अनुभव और सामाजिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहती। मीणा समाज में मजबूत पकड़ रखने वाले रावत का प्रभाव मुरैना-शिवपुरी अंचल में अहम माना जाता है। वहीं, केपी यादव ओबीसी राजनीति के मजबूत जमीनी चेहरा हैं।


