सत्ता का रौब या कानून को चुनौती? विधायक लोधी के बयान पर सियासी सन्नाटा

MP DARPAN
0

शिवपुरी। पिछोर से भाजपा विधायक प्रीतम सिंह लोधी एक बार फिर अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला सीधे पुलिस महकमे को खुलेआम धमकाने का है, जिसने कानून व्यवस्था और राजनीतिक मर्यादा दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में विधायक ने करैरा के एसडीओपी जाखड़ को न केवल अपमानजनक भाषा में हड़काया, बल्कि यह तक कह दिया कि 10 हजार कार्यकर्ताओं को लेकर उनके बंगले को गोबर से भर देंगे। बयान यहीं नहीं रुका- करैरा तेरे डैडी का नहीं है… मेरा लड़का आएगा भी और चुनाव भी लड़ेगा जैसे शब्दों ने पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा गंभीर बना दिया।

ढाई किलो से ढाई क्विंटल तक पहुंचा मुक्का

विधायक का यह कहना कि पहले मेरा मुक्का ढाई किलो का था, अब ढाई क्विंटल का हो गया है साफ तौर पर ताकत के प्रदर्शन और दबाव की राजनीति का संकेत देता है। सवाल उठ रहा है क्या यह जनप्रतिनिधि का व्यवहार है या किसी बाहुबली की चेतावनी?

पुलिस बनाम सत्ता: बेटे के मामले ने बढ़ाया विवाद

विवाद की जड़ हालिया सड़क हादसा है, जिसमें विधायक के पुत्र दिनेश लोधी पर तेज रफ्तार थार से 5 लोगों को घायल करने का आरोप है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हादसे के बाद घायलों की मदद करने के बजाय वह मौके से निकल गए। बाद में पुलिस ने उन्हें जिम से पकड़ा। सूत्रों के मुताबिक, पहले अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज हुआ, फिर दबाव बढ़ने पर विधायक पुत्र को आरोपी बनाया गया। इस बीच यह भी चर्चा में रहा कि गिरफ्तारी के दौरान कथित तौर पर उन्होंने पुलिस को चुनौती दी कि मेरा पिता विधायक है, कुछ भी कर लूंगा।

एसडीओपी पर आतंकवादी जैसा व्यवहार का आरोप

विधायक का दावा है कि उन्होंने खुद एसपी से कहकर बेटे पर मामला दर्ज करवाया, लेकिन एसडीओपी जाखड़ ने आतंकवादी जैसा व्यवहार किया। गाड़ी का दोबारा चालान, लाइसेंस निरस्तीकरण और करैरा आने से मना करने जैसे आरोपों ने विधायक को भड़का दिया।

भाजपा की चुप्पी पर सवाल

पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल सत्तारूढ़ दल की चुप्पी को लेकर उठ रहा है। सार्वजनिक मंच से पुलिस अधिकारी को धमकाने और शासकीय कार्य में बाधा डालने जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे बयानों पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह कानून के राज पर सीधा प्रश्नचिन्ह है।

जनता के बीच चर्चा, कानून बड़ा या नेता?

स्थानीय स्तर पर यह मामला अब सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बहस छिड़ गई है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है या सत्ता के सामने कमजोर पड़ जाता है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें (0)
To Top