शिवपुरी में योजनाओं के जंगल में भटकता शहर, विकास की रोशनी से अब भी कोसों दूर

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करोड़ों की योजनाएं आईं, अरबों के विकास के दावे हुए, लेकिन शहर की तस्वीर देखकर लगता है मानो विकास की गाड़ी कहीं रास्ते में ही दम तोड़ चुकी हो

शिवपुरी। कभी प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली और सुकून भरी पहचान के लिए मशहूर शिवपुरी आज सवालों के चौराहे पर खड़ी है। करोड़ों की योजनाएं आईं, अरबों के विकास के दावे हुए, लेकिन शहर की तस्वीर देखकर लगता है मानो विकास की गाड़ी कहीं रास्ते में ही दम तोड़ चुकी हो। जनता पूछ रही है कि आखिर इतने वर्षों से खर्च हो रहा पैसा गया कहां?

शहर की सड़कों पर निकलते ही विकास के दावों की हकीकत दिखाई देने लगती है। कहीं अधूरी खुदाई, कहीं उखड़ी सड़कें और कहीं धूल-गंदगी का साम्राज्य। बरसात आते ही जलभराव और सीवर की समस्या लोगों के लिए अभिशाप बन जाती है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद हालात ऐसे हैं कि नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सिंध जल परियोजना को कभी शहर की जीवनरेखा बताया गया था, लेकिन वर्षों बाद भी यह योजना उम्मीदों के अनुरूप साबित नहीं हो सकी। दूसरी ओर सीवेज परियोजना भी सवालों के घेरे में है। जनता का दर्द यह है कि योजनाओं की लागत बढ़ती गई, लेकिन सुविधाएं नहीं। शिवपुरी की पहचान कभी उसके पेड़, तालाब, झीलें और स्वच्छ वातावरण हुआ करते थे। आज वही शहर कंक्रीट, अव्यवस्था और अतिक्रमण की गिरफ्त में नजर आता है। हरियाली सिकुड़ रही है और प्राकृतिक धरोहरें उपेक्षा का शिकार हैं। शहर का सौंदर्य धीरे-धीरे फाइलों और पुराने फोटो एलबमों तक सिमटता जा रहा है। रोजगार के मोर्चे पर भी तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। युवा बेहतर अवसरों की तलाश में लगातार पलायन कर रहे हैं। पर्यटन नगरी का तमगा तो मिला, लेकिन पर्यटन से रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का वह विस्तार नहीं हो पाया जिसकी उम्मीद थी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? योजनाएं बनीं, बजट आया, काम हुए, लेकिन जनता को अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिले? शहर के लोग अब भाषणों और आश्वासनों से आगे बढ़कर जवाबदेही चाहते हैं। कभी मध्यप्रदेश का नगीना कहलाने वाली शिवपुरी आज अपने ही विकास मॉडल से सवाल पूछ रही है। शहर को नई योजनाओं से ज्यादा ईमानदार क्रियान्वयन, मजबूत निगरानी और जनहित को प्राथमिकता देने वाली व्यवस्था की जरूरत है। क्योंकि शिवपुरी अब सपने नहीं, जमीन पर बदलाव देखना चाहती है।

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